अथ ईश उवाच-मीमीहि श्लोकमास्ये-मंत्र गुनगुनायें जीवन का आनंद पायें

प्रमुख समाचार/संपादकीय

प्राचीन आर्य लोग रोग शोक उदासीनता से दूर सदा स्वस्थ तथा प्रसन्न रहकर आनंद पूर्व जीते थे। सौ वर्ष से अधिक आयु होने पर भी मस्तक पर तेज आंखों में चमक व बाजुओं में फडक़ रहती थी। सौ वर्ष की आयु में भी जवानें जैसी शक्ति तथा मस्ती का रहस्य वेदमंत्रों की श्रद्घा पूर्वक हर कार्य से पूर्व बोले जाने वाली मंत्र तथा मंत्रार्थ ध्वनियां थीं। यजुर्वेद के प्रमाण से प्रब्रवाम शरद शतम एवं भूयश्च शरद: शतातï् से वे सौ ही नहीं अपितु सौ वर्ष से भी अधिक मंत्रों को सदा गुनागुनाते जीवन का बिना रोग भरपूर आनंद लेते थे। इसी कारण प्राचीन वैदिक साहित्य में पढऩे को मिलता है-अजरो वे देवा: अर्थात मंत्र पाठ करने एवं मंत्र श्रत्यं चरामसि तदनुसार जीवन व्यतीत करने वालों को जरा कहां। जबकि आज के मंत्र ध्वनि विहीन बालक व युवा 16 व 25 वर्ष की अवस्था में ही अनेक गुप्त तथा अगुप्त रोगों से पीडि़त होकर वृद्घ दिखाई देते हैं। हमारे गुरूदेव स्वामी ब्रहममुनिजी महाराज की अवस्था भले ही अस्सी वा उससे अधिक थी परंतु मुख मंडल बालकों के समान था। आज मैं स्वयं लगभग 64 वर्ष की अवस्था में अपनी गोद में जैसे खेले हुए 20-22 के बच्चों को चेहरे पर झुर्रियां आंखों पर (चश्मा) उपनेत्र कमर को झुके हुए अपने पास आते हुए देखता हूं तो बहुत कष्टï होता है। स्वस्थता, सुंदरता तथा युवाओं जैसे शक्ति पूर्णता का रहस्य मंत्र पूर्वक प्रात: से सांयम नियम पूर्वक सब कार्य समय पर करने में है। मंत्र गुनगुनाते सूर्य से पूर्व उठें उठापान व्यायाम प्राणायाम स्नान, संध्या ध्यान यज्ञ करें एवं पूर्ण दिन सोने गप लड़ाने व्यर्थ कार्यों में समय, दृष्टिï तथा शक्ति नष्टï करने एवं दिन में श्रेष्ठता के स्थान पर अपने मस्तिष्क मन आत्मा व शरीर को समाज कल्याण परिवार कल्याण संतान कल्याण से राष्टï्रोत्थान में लगाएं। देश धर्म स्वास्थ्य तथा निष्काम सेवा का विचार करते रहने से भोग रोग शोक उदासीनता स्वत: दूर चले जाते हैं।
स्वीडन देश में इस बात का गत दिनों परीक्षण किया गया कि जब साईनस वालों को गुनगुनाने का सुभाव दिया ागया तो ऐसा करने से उनके साईनस रोग का प्राय: अंत हो गया। आर्यों का प्रत्येक कार्य किसी विशिष्टï विनियुक्त मंत्रपाठ से होता था।
संतान उत्पन्न से लेकर मुण्डन कर्णवेध अनुप्रशासन विद्याध्ययन व दाहसंस्कार भी मंत्र पूर्वक उच्च ध्वनियां से होता था वा होता है। प्रतिदिन होने वाले यज्ञ में आहूति देते अथवा प्रात: व सांय भोजन करते भी आदि और अंत में मंत्र बोलने का विधान है। वैज्ञानिक परीक्षणों से देखा गया है कि यज्ञ में जो आहूतियां मंत्र बोलकर दी गयीं थी उनका पर्यावरण व भस्म पर प्रभाव बिना मंत्र के दी गयी आहूतियों से कहीं अधिक था। मुझे यह रहस्य यज्ञ द्वारा अमलीय वर्षा के निराकरण की गवेषण के काल में पता चला।
चार वेद चार ब्राहमण गंथ (वैदिक पुराण) शास्त्र, उपनिषद रामायण अथवा महाभारत में कहीं भी रोने एवं शोक करने का उपदेश नहीं दिया गया, अपितु ठीक इस से विपरीत गाते गुनगुनाते तथा प्रसन्नता से नृत्य करने को कहा गया है। मंत्रों में गायत्री को गुनगुना सकते हैं, गायत्री के कवितार्थ को गुनगुना सकते हैं। विश्वानि देव व उसके पद्यार्थ को भी गुनगुना सकते हैं। कृण्वंतो विखम आर्यम का कात्यार्थ भी बहुत प्यार है। प्राय: ये सब आप को सभी दैनिक वैदिक दिनचर्या पुस्तकों में मिल सकते हैं। प्रात: जागरण व रात्रि के शयन और भोजन से पूर्व व पश्चात बोले जाने वाले मंत्रों का कात्यार्थ भी उपलब्ध है। मंत्र गायें गुनागुनाएं प्रसन्न रहें एवं रोग भगायें।
साईनस के साथ साथ मंत्रों व पद्यार्थों की तरडें श्वांस रोग को लाभ पहुंचाती है हमारे शरी की अनेक ग्रंथियां स्वस्था तथा रोग मुक्त होती हें।
गुनगुनाने से जीवन में मस्ती आती है शरीर में शक्ति आती है एवं मन में प्रसन्नता उत्पन्न होती है। पूर्ण इंद्रियों तथा नस नाडिय़ों में यौवन सुंदरता तथा दीर्घ आयु देने वाला रक्त शुद्घ होकर आंखों को चमक, मस्तक को तेज तथा शरीर को निरोगता देता है। आओ गुनगुनाएं, स्वस्था सुख पाऐं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *